पाँव के छालों को नहीं...

यह शायरी संघर्ष, हौसले और दोबारा उठ खड़े होने की ताक़त को बयां करती है। इसमें दर्द या थकान को नहीं, बल्कि उस रास्ते को देखा गया है जो इंसान को आगे बढ़ना सिखाता है। पाँव के छालों की बजाय धूल पर ध्यान देना, इस बात का संकेत है कि मुश्किलें रास्ता रोकने के लिए नहीं, बल्कि मज़बूत बनाने के लिए आती हैं।

इस शायरी में गिरना कमज़ोरी नहीं, बल्कि सीख बनने का प्रतीक है। गिरकर सँभलने का जो “जादुई उसूल” है, वही इंसान को आगे ले जाता है। हार को स्वीकार करना और हार मान लेना—इन दोनों के बीच का फर्क यहाँ बहुत सादगी से समझाया गया है। हारना ज़िंदगी का हिस्सा है, लेकिन खुद पर भरोसा खो देना सबसे बड़ी खता है।

मिट्टी का उदाहरण इस शायरी को और गहरा बना देता है। मिट्टी टूटती है, बिखरती है, तभी उसमें फूल खिलते हैं। यही संदेश इस रचना का दिल है—टूटने के बाद ही असली खूबसूरती जन्म लेती है। यह शायरी उन लोगों के लिए है जो मुश्किल हालात में भी उम्मीद नहीं छोड़ते और जानते हैं कि हर संघर्ष के बाद एक नया सवेरा ज़रूर आता है।

"पाँव के छालों को नहीं, बस रास्ते की धूल को देखा है,
मैंने गिरकर सँभलने के उस जादुई उसूल को देखा है।
हारना बुरा नहीं है, हार मान लेना खता है,
मिट्टी से पूछो, टूटने के बाद ही तो उसने खिलते हुए फूल को देखा है।"


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