आज कमरा...

यह शायरी उस खामोश अकेलेपन की तस्वीर है, जहाँ बाहर की दुनिया छोटी और अंदर की खाली जगह बहुत बड़ी लगने लगती है। कमरे का बड़ा लगना और शोर का छोटा पड़ जाना, उस पल को बयान करता है जब इंसान अपने ही ख्यालों के सामने अकेला खड़ा होता है। आईने में दिखता चेहरा भी अजनबी सा लगने लगता है, जैसे भीतर कुछ टूट गया हो जिसे शब्दों में कहना मुश्किल हो।

इस शायरी में मुस्कान सिर्फ़ एक कोशिश बनकर रह जाती है। हँसने की कोशिश में जब चेहरे पर शिकन आ जाए, तब समझ आता है कि दर्द अभी खत्म नहीं हुआ। वो ज़ख्म जो समय के साथ भर जाना चाहिए था, अब भी अंदर कच्चा और गहरा है। यह शायरी उसी अनकहे दर्द और अंदर छुपी हुई सच्चाई को उजागर करती है, जिसे हम अक्सर दुनिया से छुपाते रहते हैं।

यह उन लोगों के लिए है जो बाहर से सामान्य दिखते हैं, लेकिन भीतर बहुत कुछ समेटे हुए हैं। जहाँ अकेलापन शोर से ज़्यादा सुनाई देता है और आईना भी सवाल करने लगता है। अगर आपने भी कभी खुद को इस तरह महसूस किया है, तो ये शायरी आपके दिल की आवाज़ बन सकती है।

"आज कमरा बहुत बड़ा और शोर बहुत छोटा लगा,
आईने में खड़ा वो शख्स मुझे कुछ खोटा लगा।
हँसने की कोशिश में जब गालों पर शिकन आई,
तब जाना कि अंदर कोई जख्म अब भी गहरा और कच्चा लगा।"

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