पिता का कंधा: पुत्र के लिए दुनिया का सबसे ऊँचा मुकाम
पिता और पुत्र का संबंध अक्सर शब्दों की मोहताजी नहीं रखता। यह एक ऐसा मौन संवाद है जहाँ अनुशासन की परतों के नीचे गहरे प्रेम का सागर छिपा होता है। एक पिता अपने पुत्र के लिए उस नीले आसमान की तरह होता है जो उसे उड़ने के लिए विस्तार भी देता है और उसे हर तूफान से बचाने के लिए ढाल भी बना रहता है। बचपन में पिता का हाथ थामकर जो सुरक्षा महसूस होती है, वह एहसास बड़े होने के बाद भी पुत्र के आत्मविश्वास की रीढ़ बना रहता है।
अक्सर देखा गया है कि एक पिता अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में थोड़े संकोची होते हैं। वे माँ की तरह रोकर या गले लगाकर प्यार नहीं जताते, बल्कि वे उस वक्त प्यार जताते हैं जब वे आधी रात को आपकी पढ़ाई के लिए रोशनी का इंतज़ाम करते हैं या आपकी पहली नौकरी लगने पर अपनी पुरानी घड़ी को बार-बार देखते हुए गर्व से मुस्कुराते हैं। पिता की सख्ती दरअसल एक सुरक्षा कवच है जो पुत्र को दुनिया की चुनौतियों के लिए तैयार करती है। एक पुत्र के लिए उसके पिता का व्यक्तित्व वह कसौटी है जिस पर वह खुद को परखता है।
जब पुत्र बड़ा होकर पिता के जूतों में पैर रखने लायक हो जाता है, तब उसे अहसास होता है कि वह जिम्मेदारियाँ कितनी भारी थीं जिन्हें उसके पिता ने हँसते-हँसते उठाया था। एक सफल पुत्र वही है जो अपने पिता के सफेद बालों और उनके हाथों की झुर्रियों में छिपे संघर्ष को पहचान सके। यह रिश्ता केवल खून का नहीं, बल्कि एक विरासत का है—संस्कारों की विरासत, ईमानदारी की विरासत और कभी न हार मानने वाले जज्बे की विरासत। इसी अनमोल रिश्ते की गहराई को इन पंक्तियों में पिरोया गया है:
"पिता की उँगली पकड़कर चलना सीखा है हमने,
कड़ी धूप में भी छाँव में पलना सीखा है हमने।
वो नींव हैं मेरे घर की, वो मेरा अभिमान हैं,
मेरे पिता ही मेरी दुनिया, मेरा पूरा आसमान हैं।"