नज़र और नसीब...

ज़िंदगी कई बार हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहाँ चाहत और हक़ीक़त एक-दूसरे से टकराने लगते हैं। दिल कुछ चाहता है, नज़र किसी और ही दुनिया में खो जाती है, लेकिन नसीब अपनी ही कहानी लिख रहा होता है। यही इस शायरी का मूल भाव है—नज़र और नसीब के बीच का वह अनकहा टकराव, जिसे लगभग हर इंसान अपनी ज़िंदगी में कभी न कभी महसूस करता है।

नज़र उस चीज़ को पसंद करती है, जो सामने होती है, जो दिल को तुरंत छू जाती है। नज़र को सपने दिखाना आता है, वह उम्मीद जगाती है और हमें यकीन दिलाती है कि यही वह है, जिसकी हमें तलाश थी। लेकिन अक्सर वही पसंद, वही चाहत, हमारे नसीब में नहीं होती। यह एहसास बेहद चुपचाप दिल को तोड़ता है, क्योंकि यहाँ कोई गलती नहीं होती—न नज़र की, न दिल की। फिर भी खालीपन रह जाता है।

दूसरी ओर नसीब अपनी गति से चलता है। वह हमें वह देता है, जो शायद उस समय हमें चाहिए होता है, लेकिन जिसे हम पहचान नहीं पाते। नसीब में लिखा हुआ अक्सर तब सामने आता है, जब नज़र किसी और ओर लगी होती है। हम उसे देख ही नहीं पाते, समझ ही नहीं पाते। और जब समझ आते-आते देर हो जाती है, तब एहसास होता है कि जो मिला, वह शायद पहले ही हमारे आस-पास था।

यह शायरी उसी अधूरेपन की कहानी है—जहाँ चाहत पूरी न होने का दर्द भी है और नसीब पर सवाल उठाने की बेबसी भी। इंसान खुद से पूछता है कि अगर नसीब में कुछ और ही लिखा था, तो दिल को किसी और की चाहत क्यों दी गई? नज़र को उस तरफ क्यों खींचा गया, जहाँ पहुँच पाना मुमकिन नहीं था? ये सवाल अक्सर बिना जवाब के रह जाते हैं।

प्यार और ज़िंदगी के मामलों में नज़र और नसीब का ये खेल सबसे ज़्यादा महसूस होता है। हम किसी को देखकर उसे अपना मान लेते हैं, लेकिन हालात, समय या तक़दीर हमें अलग दिशा में ले जाते हैं। फिर इंसान यही कहकर खुद को समझाता है कि जो हुआ, अच्छे के लिए हुआ होगा। लेकिन दिल मानने में समय लेता है। वह हर बार वही चेहरा, वही एहसास ढूँढता है, जो नसीब का हिस्सा नहीं बन पाया।

इस शायरी की खूबसूरती इसकी सच्चाई में है। यह किसी बड़े दर्शन की बात नहीं करती, बल्कि रोज़मर्रा के एहसासों को शब्द देती है। हर वह इंसान जिसने किसी को चाहा और पाया नहीं, इस शायरी में खुद को देख सकता है। यह शायरी शिकायत नहीं करती, बस हालात को स्वीकार करती है—शांत, गहरी और सच्ची।

नज़र और नसीब के इस इत्तेफाक में एक सीख भी छुपी है। शायद हर पसंद मिलना ज़रूरी नहीं होता, और जो नसीब में होता है, वह धीरे-धीरे अपनी अहमियत खुद साबित कर देता है। कई बार हम जिस चीज़ को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, वही आगे चलकर हमारी ज़िंदगी का सबसे मजबूत सहारा बन जाती है। लेकिन यह समझ अक्सर बहुत देर से आती है।

यह शायरी हमें सब्र सिखाती है—अपने दिल के साथ भी और अपनी तक़दीर के साथ भी। यह बताती है कि हर चाहत का पूरा होना ज़रूरी नहीं, लेकिन हर अनुभव हमें कुछ न कुछ सिखाकर ज़रूर जाता है। नज़र का धोखा और नसीब की सच्चाई—इन दोनों के बीच ही इंसान परिपक्व होता है।

जब कोई इस शायरी को पढ़ता है, तो वह सिर्फ़ शब्द नहीं पढ़ता, बल्कि अपनी ज़िंदगी के कुछ अधूरे पन्ने पलटता है। उसे अपने पुराने फैसले, छूटे हुए लोग और अनकही चाहतें याद आती हैं। यही वजह है कि यह शायरी चुपचाप दिल में उतर जाती है और देर तक असर छोड़ती है।

अंत में, यह शायरी हमें यह स्वीकार करना सिखाती है कि ज़िंदगी हमेशा हमारी पसंद के मुताबिक नहीं चलती। कभी नज़र जीत जाती है, कभी नसीब। और शायद इसी असंतुलन में ज़िंदगी की असली कहानी छुपी होती है। जो मिला, उसे समझने की कोशिश करना और जो नहीं मिला, उसे सम्मान के साथ छोड़ देना—यही इस शायरी का सबसे गहरा संदेश है।

नज़र और नसीब का कुछ ऐसा इत्तेफाक है,
नज़र को वो पसंद है जो नसीब में नहीं,
और नसीब में वो लिखा है जो अब तक नज़र में नहीं।



إرسال تعليق

أحدث أقدم