आत्मसम्मान: भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाने का हुनर
आज की इस भागदौड़ भरी दुनिया में, जहाँ हर कोई एक-दूसरे जैसा दिखने और बनने की होड़ में लगा है, 'आत्मसम्मान' (Self-Respect) ही वह गुण है जो हमें इंसानों की भीड़ से अलग करता है। अक्सर हम दूसरों को खुश करने के प्रयास में खुद को कहीं पीछे छोड़ देते हैं। लेकिन याद रखिये, जो व्यक्ति अपनी खुद की कद्र नहीं कर सकता, दुनिया कभी उसका सम्मान नहीं करती। आत्मसम्मान का अर्थ अहंकार नहीं है, बल्कि अपनी सीमाओं को जानना और अपने मूल्यों से समझौता न करना है।
आत्मसम्मान की यात्रा तब शुरू होती है जब आप खुद को दूसरों की नजरों से देखना बंद कर देते हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि 'लोग क्या कहेंगे', और इसी डर में अपनी खुशियों और अपने सपनों की बलि चढ़ा देते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि लोग केवल तब तक आपके साथ हैं जब तक आप उनके सांचे में फिट बैठते हैं। जिस दिन आप अपनी आवाज बुलंद करते हैं, आप अकेले पड़ सकते हैं, पर वह अकेलापन कमजोरी नहीं, बल्कि आपकी सबसे बड़ी ताकत होती है।
सफलता के शिखर पर पहुँचने के लिए केवल कौशल (Skills) की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि एक मजबूत चरित्र और स्वाभिमान की भी जरूरत होती है। जब आप खुद पर विश्वास करते हैं, तो आपकी ऊर्जा बदल जाती है। लोग आपकी ओर आकर्षित होने लगते हैं क्योंकि वे आपके आत्मविश्वास का सम्मान करते हैं। आत्मसम्मान आपको सिखाता है कि हारने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन अपनी नजरों में गिरकर जीतना सबसे बड़ी हार है।
जीवन में कई बार ऐसे मोड़ आएंगे जहाँ आपको अपनी गरिमा और लाभ के बीच चुनाव करना होगा। ऐसे समय में हमेशा अपनी गरिमा को चुनें। पैसा, शोहरत और रिश्ते वापस आ सकते हैं, लेकिन खोया हुआ आत्मसम्मान कभी वापस नहीं आता। अपनी पहचान को इतना बुलंद बनाइये कि आपको किसी के परिचय की आवश्यकता न पड़े। इसी अटूट आत्मविश्वास और खुद्दारी को समर्पित है यह विशेष शायरी:
"परख से परे, मैं अपनी एक पहचान रखता हूँ,
उड़ान में अपनी, मैं ऊँचा आसमान रखता हूँ।
भीड़ का हिस्सा बनना मेरी आदत नहीं कभी,
मैं अकेला ही सही, पर अपना स्वाभिमान रखता हूँ।"