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वसीम बरेलवी उर्दू अदब का बहुत खूबसूरती से इस्तेमाल करने वाले एक भारतीय उर्दू शायर हैं। बरेली से ताल्लुक रखने वाले  जाहिद हुसैन जो “वसीम बरेलवी” के नाम से मशहूर है wasim barelvi ki shayari 

वसीम की लिखी ग़ज़लें बहुत लोकप्रिय हुई हैं। ग़ज़ल सम्राट स्वर्गीय जगजीत सिंह साहब ने भी इनकी कई ग़ज़लों को गाया है, वसीम बरेलवी ने अपनी शायरी के माध्यम से लाखों भारतीयों के दिलों पर राज किया है। उन्होंने अपनी शायरी में उर्दू की नाजुक प्रकृति और उच्चारण के साथ रोमांटिक जज्बातो को भी पिरोया है, “फ़िराक इंटरनेशनल अवार्ड” से सम्मानित वसीम बरेलवी साहब का रुतबा इसी से समझा जा सकता है कि आज के युग में उनकी मौजूदगी के बिना कोई भी मुशायरा उनकी शायरी के बिना पूरा नहीं होता है। वर्तमान में, वह रुहेलखंड विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग में प्रोफेसर हैं और उर्दू भाषा को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय परिषद के उपाध्यक्ष हैं।

Husn bazar hua kya ki Hunar khatm Hua Aaya Palko pe to Aansu ka Safar Khatm hua

हुस्न बाज़ार हुआ क्या कि हुनर ख़त्म हुआ
आया पलको पे तो आँसू का सफ़र ख़त्म हुआ

Umr Bhar tujse Bichadne ki Kasak hee na gayi

Kaun Kehta hai ki mohabbat ka Asar Khatm hua

उम्र भर तुझसे बिछड़ने की कसक ही न गयी ,
कौन कहता है की मुहब्बत का असर ख़त्म हुआ

Nayi Colony me bachcho ko zide  le to gayi

Baap Dada ka banaya hua ghar khatm Hua

नयी कालोनी में बच्चों की ज़िदे ले तो गईं ,
बाप दादा का बनाया हुआ घर ख़त्म हुआ

Ja  Hamesha ko mujhe Chod Ke Jane WaleTujh se har lamha Bichadne Ka to dar Khatm Hua

जा, हमेशा को मुझे छोड़ के जाने वाले ,
तुझ से हर लम्हा बिछड़ने का तो डर ख़त्म हुआ.

Tumhari Raah me Mitti ke Ghar Nahi AateIssiliye toa tumhe ham Nazar nhi aate

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते

Mohabbato ke Dino ki yahi Kharabi hai Ye Rooth jaye to fir Lautker nahi aate

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते

Jinhe saleeka hai Tehzeeb Ae Gam Samajhne ka,Unhi ke Rone me Aansu Nazar nhi Aate

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते

Khushi ki Aankh mein aansu ki bhi jagah Rakhna,Bure Zamane kabhi Puchkar nhi Aate

ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते

Bisaat Ae  Ishq pe Badhna kise nhi aata Yeh aur baat ki Bachne ke ghar nhi aate

बिसाते-इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते

Wasim Zehan Banate hai to toa wahi Akhbaar Jo leke ek bhi Achchi Khabar nhi aate

“वसीम” जहन बनाते हैं तो वही अख़बार
जो लेके एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते

Kaun si naat Kahan, Kaise Kahi Jati hai Ye salika ho, To har baat suni jati hai

कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है
ये सलीक़ा हो, तो हर बात सुनी जाती है

Jaisa chaha tha tujhe, Dekh na Paye Duniya Dil me bas ek ye hasrat he rahi jati hai

जैसा चाहा था तुझे, देख न पाये दुनिया
दिल में बस एक ये हसरत ही रही जाती है

Ek Bigdi hui aulad Bhala kya jaane Kaise Maa Baap ke honto se Hansi jati hai

एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जाने
कैसे माँ-बाप के होंठों से हँसी जाती है

Karz ka Bojh Uthaye hue Chalne ka Azaab Jaise ser par koi Deewar Giri Jati hai

कर्ज़ का बोझ उठाये हुए चलने का अज़ाब
जैसे सर पर कोई दीवार गिरी जाती है

Apni Pehchaan Mita dena ho Jaise Sab kuch Jo Nadee hai wo samandar se Mili Jati Hai

अपनी पहचान मिटा देना हो जैसे सब कुछ
जो नदी है वो समंदर से मिली जाती है

Poochna hai toa Gazal walo se poocho jaker Kaise har Baat Salike se kahi jati hai

पूछना है तो ग़ज़ल वालों से पूछो जाकर
कैसे हर बात सलीक़े से कही जाती

Kahan tak Aankh royegi kahan tak Kiska gam hoga, mere jaisa yahan koi na koi Roj Kam hoga

कहाँ तक आँख रोएगी कहाँ तक किसका ग़म होगा
मेरे जैसा यहाँ कोई न कोई रोज़ कम होगा

Tujhe Pane ki Koshish me kuch itna Ro chuka hun Mai,Ki tu Mil bhi Agar jaye toa ab milne ka gam Hoga

तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना रो चुका हूँ मैं
कि तू मिल भी अगर जाये तो अब मिलने का ग़म होगा

Samandar ki galatfehmi se koi Pooch toa Leta,Zameen ka honsla kya aise Toofano se kam hoga

समन्दर की ग़लतफ़हमी से कोई पूछ तो लेता ,
ज़मीं का हौसला क्या ऐसे तूफ़ानों से कम होगा

Mohabbat Naapne ka Koi Paimana Nhi Hota Kahin tu badh bhi Sakta hai, kahin Tu Mujh se kam Hoga

मोहब्बत नापने का कोई पैमाना नहीं होता , कहीं तू बढ़ भी सकता है, कहीं तू मुझ से कम होगा

Kya bataun kaise khud ko Dar-Ba-Dar Maine Kiya,umr bhar kis- kis ke hisse ka Safar maine kiya

क्या बताऊं कैसे ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया,
उम्र भर किस-किस के हिस्से का सफ़र मैंने किया ।

Tu toa nafrat bhi na kar payega Uss Shiddat se,Jis Bala ka Pyar Tujhse Be-Khabar Maine kiya

तू तो नफ़रत भी न कर पाएगा उस शिद्दत से जिस बला का प्यार तुझसे बे-ख़बर मैंने किया ।

Kaise Bachcho ko Batau Raasto ke Pencho kham , Zindagi bhar to Kitabo ka Safar Maine kiya

कैसे बच्चों को बताऊँ रास्तों के पेचो-ख़म (घुमाव-फिराव)
ज़िन्दगी भर तो किताबों का सफ़र मैंने किया ।

Shoharato ki Nazar kar di Sher ki Maasumiyat, Iss Diye ki Roshni ko dar-ba-dar Maine kiya

शोहरतों  की नज़र कर दी शेर की मासूमियत,
इस दिये की रोशनी को दर-ब-दर मैंने किया ।

Chand Zajbato se Rishton ko Bachane ko Waseem, kaisa -kaisa Zabr apne aap per mene kiya

चंद जज़्बातों से रिश्तों के बचाने को ‘वसीम‘,
कैसा-कैसा जब्र (अत्याचार) अपने आप पर मैंने किया ।

Me apne khwaab se  Bichada Nazar nahi aata,Tu iss Sadi me akela Nazar nhi aata

मैं अपने ख़्वाब से बिछ्ड़ा नज़र नहीं आता
तू इस सदी में अकेला नज़र नहीं आता

Ajab Dabaav hai inn bahari Hawao ka Gharo ka Bojh bhi uthta Nazar nhi aata

अजब दबाव है इन बाहरी हवाओं का
घरों का बोझ भी उठता नज़र नहीं आता

Me Ek Sada pe hamesha ko Ghar Chod aaya Magar Pukarne wala Nazar nhi aata

मैं इक सदा पे हमेशा को घर छोड़ आया
मगर पुकारने वाला नज़र नहीं आता

Me teri Raah se hatne ko hat gaya Lekin Mujhe toa koi bhi Raasta Nazar nhi aata

मैं तेरी राह से हटने को हट गया लेकिन
मुझे तो कोई भी रस्ता नज़र नहीं आता

Dhuan bhara hai yahan toa sabhi ki aankho meKisi ko ghar mera Jalta Nazar nhi aata

भरा है यहाँ तो सभी की आँखों में

किसी को घर मेरा जलता नज़र नहीं आता

Kya dukh hai, samandar ko bata bhi nhi sakta,Aansu ki tarah aankh tak aa bhi nhi sakta

क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता

Tu chod raha hai,to khata isme teri kya Har shakhs mera sath , nibha bhi nhi sakta

तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसमें तेरी क्या
हर शख़्स मेरा साथ, निभा भी नहीं सकता

Pyase rahe jate hai Zamane ke Sawalaat

Kiske liye zinda hun, Bata bhi nhi sakta

प्यासे रहे जाते हैं जमाने के सवालात
किसके लिए ज़िन्दा हूँ, बता भी नहीं सकता

Ghar dhoond rahe hai mera, Raaton ke pujari Mai hu ki Charago ko, bujha bhi nhi sakta

घर ढूँढ रहे हैं मेरा , रातों के पुजारी
मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता

Waise to ek aansu he baha ke le jaye mujheAise koi toofan hila bhi nhi sakta

वैसे तो एक आँसू ही बहा के मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता

Apne har ek Lafz ka khud aaina ho jaunga Usko chota keh ke mai kaise bada ho jaunga

अपने हर इक लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

Tum girane me Lage the, Tum ne socha bhi nhi,Mai Gira toa Masla bankar khada ho jaunga

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा भी नहीं
मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा

Mujh ko chalne do akela, hai abhi mera safar Rasta roka gaya toa kaafila ho jaunga

मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

Sari duniya ki Nazar me hai Meri ahad-a-Wafa,Ek tere kehne se kya mai Bewafa ho jaunga

सारी दुनिया की नज़र में है मेरी अह्द—ए—वफ़ा
इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा

Mai iss umeed pe dooba ke tu bacha lega Ab iske baad mera imtihaan kya lega

मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा

Ye ek Mela hai , wada kisi se kya lega Dhalega din toa har ek apna raasta lega

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

Mai Bujh gaya toa hamesha ko bujh hee jaunga , Koi Charaag nhi hu jo fir jala lega

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा

Kaleja chahiye Dushman se Dushmani ke liye Jo Be-Amal Hai, wo badla kisi se kya lega

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

Mai uska ho nahi sakta, bata na dena use Sunega toa Lakeeren Hath ki apni jala lega

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा

Hazaar tod ke aa jau us se rishta wasim Mai janata hu wo jab chahega  bula lega

हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता  “वसीम”
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा

उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटें
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में त’अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

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