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मिर्जा ग़ालिब, ghalib और मिर्ज़ा असद-उल्लाह ख़ां के नाम सेे प्रसिद्ध उर्दू और फ़ारसी के इस महान शायर का जन्म 27 दिसंबर, 1796 को आगरा में हुआ था।

इनके दादा समरकंद से 1790 ईसवी में भारत आये थे और आगरा में बस गए। बाद में ग़ालिब दिल्ली आ गए और वो आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफ़र के दरबार मे दरबारी कवि रहे।

Mirza ghalib ki shayari

ग़ालिब को उनकी उर्दू ग़ज़लो के लिए याद किया जाता है। उन्होने अपने बारे में लिखा था कि दुनिया में यूं तो बहुत अच्छे शायर हैं, लेकिन उनक अंदाज़ सबसे निराली है:

अपनी ज़िंदगी की जद्दोजहद और संघर्ष को ग़ालिब ने अपनी शायरी में पिरोया है।

ग़ालिब का अंदाज़ बहुत अलग है। दार्शनिकता से भरपूर, दुनिया भर में करोड़ो लोग आज भी उनकी शायरी के कायल है।ग़ालिब को सुनना ,पढ़ना हमेशा ही एक अलग मज़ा देता है।

15 फरवरी, 1869 को दिल्ली में ग़ालिब मुफलिसी में इस दुनिया को छोड़ गए। मगर आज भी अपने शेरो में,ग़ज़लों में वो ज़िंदा है। उर्दू फ़ारसी में लिखने वाले मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू जबान का एक चमकता तारा है। जो हमेशा जगमगाता रहेगा

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