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शायद मैं ज़िंदगी की सहर लेके आ गया

क़ातिल को आज अपने ही घर लेके आ गया

 
 

 
 

ता-उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की,

अंजाम ये के गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया

 क़ातिल को आज अपने ही घर लेके आ गया

नश्तर है मेरे हाथ में, कांधों पे मैक़दा नश्तर है मेरे हाथ में,

कांधों पे मैक़दा , लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिगर लेके आ गया

क़ातिल को आज अपने ही घर…

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