कविता

हिज़्र का ज़ख्म मुहब्बत का शफ़ाख़ाना है,ऐ मेरे दिल तुझे ज़ख्मों में मुस्कुराना है- सोनिया खुरानिया

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किस तरह आँख में आँसू उतार देती हो,
याद-ए-माज़ी मुझे मुश्किल में डाल देती हो,

हर कोई दर्द दिखाने के नहीं होता काबिल,
तालियाँ पीटने वालों के हाथों में रुमाल देती हो,

मैं तुमको जश्न की तरह जब भी जीना चाहती हूँ ज़िंदगी,
तुम भीड यूँ जमा करती हो,मेरी मैयत निकाल देती हो,

मैं तसल्ली देके बैठी हूँ कोई हमराज़ ना मेरा,
मगर कोई प्यार से बोले तुम मेरा दिल उछाल देती हो,

किसी का भी दख़ल बर्दाश्त ना तन्हाई में मेरे,
तुम ‘ उसे ‘ सामने करके मेरी नीयत में भूचाल देती हो,

अरे जाओ नहीं पडना है उसके इश्क़ में फिर से,
अभी तो निकले भी नहीं पूरे,तुम फिर गलतफहमियाँ पाल देती हो

Soniya khurania

हिज़्र का ज़ख्म मुहब्बत का शफ़ाख़ाना है।

हिज़्र का ज़ख्म मुहब्बत का शफ़ाख़ाना है,
ऐ मेरे दिल..तुझे ज़ख्मों में मुस्कुराना है,

ग़र किसी रोज़ तेरा दर्द छील जाए ना,
हमको लगता है कहीं कच्चा तो नहीं याराना है,

ये मुहब्बत ही है पुश्तों तलक जो चलती है,
बाद मरके भी रहता ज़िदा घर-घराना है,

ना तो तुम्हे पा सके,ना तुम गये हममें से कभी,
लोग कहते हैं ये हमारा ख्वामख्वाह का छटपटाना है,

और चाहा भी क्या,कुछ तेज़ धडकनों के सिवा,
और फिर ये कि तेरा आज भी हममें आना-जाना है,

कोई कितना भी कहे उस तरफ जाते ही नहीं,
जिस तरफ इश्क़ हो, हमें अपना दिल बचाना है।

Soniya khurania

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