कविता

जीते जी दाह का भाग लिए माथे पर, फुंकती जाती हैं

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अंगीठी होती हैं कुछ औरतें,
जीते जी दाह का भाग लिए माथे पर,
फुंकती जाती हैं,
कच्चे कोयले दबाए खुद में,
लीपी जाती हैं कर्तव्य की मिट्टी से,
पकाने को, ताकि भोगी जा सकें,
तपाई जाती हैं ताकि जलाई जा सकें,
और कर सकें क्षुधा शांत,
जलती हैं भट्टी जैसे और जलना ही
नियती मान स्वीकारती हैं
हर बार बुझाई जाना,
और फिर जब चाहे जलाई जाना,


वो ज़रूरी होती हैं हर घर
में एक रसोई जितनी,
वो उम्र भर छिपी रहती हैं,
महक देती हैं, उत्सवों में जान
फूँक देती हैं,
लज़्ज़्त भर देती हैं आँगन भर में,
सब खिलखिलाते हैं,
बातों के चटखारे लगाते हैं,
और चले जाते हैं
ज़ायके से सराबोर होकर,
जो बाँटती है अंगीठी,

मगर कोई नहीं पूछता
ये ज़ायका आया कहाँ से,
अंगारे भरे खुद में
धुंआ-धुंआ,
कसमसाती तो हैं,
ये कसमसाहट वो उठती
हुई लपटें,बताती तो हैं,
मगर वो पडी रहती हैं
एक कोने में,
क्योंकि उन्हे सिर्फ भोग्या
होना आता है,
भोगना नहीं,
जलने को तत्पर,
बुझने को तत्पर,

सोनिया खुरानिया✍

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