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मैं लड़खड़ा रहा हूँ तुझे देख-देखकर तूने तो मेरे सामने इक जाम रख दिया

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क़तील शिफ़ाई

24 दिसम्बर 1919 (Pakistan) से 11 जुलाई 2001

आओ कोई तफरीह का सामान किया जाए

आओ कोई तफरीह का सामान किया जाए
फिर से किसी वाईज़ को परेशान किया जाए॥

बे-लर्जिश-ए-पा मस्त हो उन आँखो से पी कर
यूँ मोह-त-सीबे शहर को हैरान किया जाए॥

हर शह से मुक्क्दस है खयालात का रिश्ता
क्यूँ मस्लिहतो पर इसे कुर्बान किया जाए॥

मुफलिस के बदन को भी है चादर की ज़रूरत

Khoobsurat shayari,
JAAM RAKH DIYA


अब खुल के मज़रो पर ये ऐलान किया जाए॥

वो शक्स जो दीवानो की इज़्ज़त नहीं करता
उस शक्स का चाख-गरेबान किया जाए॥

पहले भी ‘कतील’ आँखो ने खाए कई धोखे
अब और न बीनाई का नुकसान किया जाए॥

दुनिया ने हम पे जब कोई इल्ज़ाम रख दिया
हमने मुक़ाबिल उसके तेरा नाम रख दिया

इक ख़ास हद पे आ गई जब तेरी बेरुख़ी
नाम उसका हमने गर्दिशे-अय्याम (SAMAY CHAKRA) रख दिया

मैं लड़खड़ा रहा हूँ तुझे देख-देखकर
तूने तो मेरे सामने इक जाम रख दिया

कितना सितम-ज़रीफ़ (Haste haste julm karne wala) है वो साहिब-ए-जमाल
उसने जला-जला के लबे-बाम ( Khidki per) रख दिया

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KHAUF KA NAAM KHUDA RAKH DIYA


इंसान और देखे बग़ैर उसको मान ले
इक ख़ौफ़ का बशर ने ख़ुदा नाम रख दिया

अब जिसके जी में आए वही पाए रौशनी
हमने तो दिल जला के सरे-आम रख दिया

क्या मस्लेहत-शनास (ghagh) था वो आदमी ‘क़तील’
मजबूरियों का जिसने वफ़ा नाम रख दिया

 

 

इक-इक पत्थर जोड़ के मैंने जो दीवार बनाई है
झाँकूँ उसके पीछे तो रुस्वाई ही रुस्वाई है

यों लगता है सोते जागते औरों का मोहताज हूँ मैं
आँखें मेरी अपनी हैं पर उनमें नींद पराई है

देख रहे हैं सब हैरत से नीले-नीले पानी को
पूछे कौन समन्दर से तुझमें कितनी गहराई है

सब कहते हैं इक जन्नत उतरी है मेरी धरती पर
मैं दिल में सोचूँ शायद कमज़ोर मेरी बीनाई है

बाहर सहन में पेड़ों पर कुछ जलते-बुझते जुगनू थे
हैरत है फिर घर के अन्दर किसने आग लगाई है

आज हुआ मालूम मुझे इस शहर के चन्द सयानों से
अपनी राह बदलते रहना सबसे बड़ी दानाई है

तोड़ गये पैमाना-ए-वफ़ा इस दौर में कैसे कैसे लोग
ये मत सोच “क़तील” कि बस इक यार तेरा हरजाई है

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