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उर्दू शायरी के उस्ताद मीर है MEER

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गालिब उर्दू शायरी का एक कद्दावर शायर है ,ग़ालिब को उर्दू शायरी में एक आला मकाम हासिल है जो अपने बारे में खुद कहते है की

“हैं और भी दुनिया में सुखन-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘गालिब’ का है अंदाज-ए-बयां और”

लेकिन वही गालिब जब मीर के बारे में कहते है की

“रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो गालिब, कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था”

इस शेर से आप मीर की बादशाहत का अंदाज़ा लगा सकते है


भारत के शहर आगरा में, जो उस वक़्त अकबर का बसाया अकबराबाद था वहां 1722 ईस्वी में एक गरीब परिवार में जन्म हुआ था मीर तकी मीर का 11 साल की छोटी सी उम्र में माता पिता के देहांत के बाद मीर अकेले  हो गए तो वो
वो आगरा से दिल्ली आ गए. दिल्ली में उनकी मुलाकात ख्वाजा मोहम्मद बासित से हुई जिन्हीने उन्हें सहारा दिया और
नवाब सम्सामुद्दौला के यहाँ नौकरी पर लगा दिया, नवाब सम्सामुद्दौला के यहां ही इन्होंने उर्दू की अदब और ज़ुबान पर पकड़
बनाई , उन दिनों दिल्ली शायरों का गढ़ था तो अच्छे शायरों की सोहबत से उनमे और अधिक निखार आया


मीर ने अपनी उर्दू शायरी में फ़ारसी और हिन्दुस्तानी के शब्दों का अच्छा मिश्रण किया जिसके लिए आज भी उन्हें याद किया जाता है!सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन उन दिनों दिल्ली की मुग़ल सल्तनत कमजोर थी और आक्रांता नादिरशाह ने 1739 ईस्वी में दिल्ली पर हमला कर दिया और मीर के सरपरस्त नवाब सम्सामुद्दौला उसमें क़त्ल कर दिए गए ।
अहमद शाह अब्दाली और नादिरशाह के हमलों की वहशत को मीर तक़ी मीर ने अपनी आंखों से देखा था, और उनकी कई ग़ज़लों में भी यह देखने को मिलता है।

आख़िरकर मीर लखनऊ चले गए जहां नवाब आसफउद्दौला ने उन्हें तीन सौ रुपये वजीफे पर अपने दरबार में रख लिया। मीर ने वहां सुकून से अपनी जिंदगी बिताई और और उनकी शायरी परवान चढ़ी , 21 सितंबर 1810 को 89 की उम्र में ये अजीम शायर दुनिया से रुखसत हो गए लेकिन 2500 ग़ज़लों का जो खज़ाना लिख गए, वो अनमोल है आज भी उनके शेर फिल्मो में , मुशायरो में सुनाये जाते है ! और उन्हें उर्दू शायरी में आला मकाम हासिल है

बेखुदी ले गयी बेखुदी ले गयी कहाँ हम को देर से इंतज़ार है!

अपना रोते फिरते हैं सारी-सारी रात अब यही रोज़गार है!

अपना दे के दिल हम जो हो गए मजबूर इस में क्या इख्तियार है!

अपना कुछ नही हम मिसाले-अनका लेक शहर-शहर इश्तेहार है!

अपना जिस को तुम आसमान कहते हो सो दिलों का गुबार है अपना

 

अश्क आंखों में कब नहीं आता

अश्क आंखों में कब नहीं आता
लहू आता है जब नहीं आता।

होश जाता नहीं रहा लेकिन
जब वो आता है तब नहीं आता।

दिल से रुखसत हुई कोई ख्वाहिश
गिरिया कुछ बे-सबब नहीं आता।

इश्क का हौसला है शर्त वरना
बात का किस को ढब नहीं आता।

जी में क्या-क्या है अपने ऐ हमदम
हर सुखन ता बा-लब नहीं आता।

आरज़ूएं हज़ार रखते हैं
तो भी हम दिल को मार रखते हैं

बर्क़ कम हौसला है हम भी तो
दिल एक बेक़रार रखते हैं

ग़ैर है मूराद-ए-इनायत हाए
हम भी तो तुम से प्यार रखते हैं

न निगाह न पयाम न वादा
नाम को हम भी यार रखते हैं

हम से ख़ुश ज़म-ज़मा कहाँ यूँ तो
लब-ओ-लहजा हज़ार रखते हैं

छोटे दिल के हैं बुताँ मशहूर
बस यही ऐतबार रखते हैं

फिर भी करते हैं “मीर” साहिब इश्क़
हैं जवाँ इख़्तियार रखते हैं

 

 

पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है

पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है

लगने न दे बस हो तो उस के गौहर-ए-गोश के बाले तक
उस को फ़लक चश्म-ए-मै-ओ-ख़ोर की तितली का तारा जाने है

आगे उस मुतक़ब्बर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं
कब मौजूद् ख़ुदा को वो मग़रूर ख़ुद-आरा जाने है

आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में
जी के ज़िआँ को इश्क़ में उसके अपना वारा जाने है

चारागरी बीमारि-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है

क्या ही शिकार-फ़रेबी पर मग़रूर है वो सय्यद बच्चा
त’एर उड़ते हवा में सारे अपनी उसारा जाने है

मेहर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं
और तो सब कुछ तन्ज़-ओ-किनाया रम्ज़-ओ-इशारा जाने है

क्या क्या फ़ितने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना
जिस बेदिल बेताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है

आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक उम्र दो बारा जाने है

रख़नों से दीवार-ए-चमन के मुँह को ले है छिपा यानि
उन सुराख़ों के टुक रहने को सौ का नज़ारा जाने है

तश्‍ना-ए-ख़ूँ है अपना कितना ‘मीर’ भी नादाँ तल्ख़ीकश
दमदार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है

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