GAZAL

इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या ..abhi to Ishq ki shuruaat hai meer

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इब्तिदा-ए-इश्क़  है! 

[इश्क़ की शुरुआत ]

इब्तिदा-ए-इश्क़  है रोता है क्या

आगे-आगे देखिये होता है क्या


क़ाफ़िले में सुबह के इक शोर है

यानी ग़ाफ़िल [ बेखबर ]हम चले सोता है क्या

सब्ज़ [Green] होती ही नहीं ये सरज़मीं

तुख़्मे-ख़्वाहिश [ seed of desires ] दिल में तू बोता है क्या

ये निशान-ऐ-इश्क़ हैं जाते नहीं दाग़ छाती के

अबस [बिना बात के ] धोता है क्या

ग़ैरते-युसूफ़ है ये वक़्त ऐ अजीज़ ‘मीर’

इस को रायेग़ाँ [बेकार में) खोता है क्या

 

न सोचा न समझा न सीखा न जाना
मुझे आ गया ख़ुदबख़ुद दिल लगाना

ज़रा देख कर अपना जल्वा दिखाना
सिमट कर यहीं आ न जाये ज़माना

ज़ुबाँ पर लगी हैं वफ़ाओं कि मुहरें
ख़मोशी मेरी कह रही है फ़साना

गुलों तक लगायी तो आसाँ है लेकिन
है दुशवार काँटों से दामन बचाना

करो लाख तुम मातम-ए-नौजवानी
प ‘मीर’ अब नहीं आयेगा वोह ज़माना

 

 

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